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उत्तराखंड हाईकोर्ट का कहना है कि अज्ञात लोगों के इशारे पर दायर की जा रही हैं याचिकाएं

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नताली। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण मामले में दायर याचिका को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिका दायर करने के लिए न्यायिक प्रणाली या उपकरण का इस्तेमाल किया जा रहा है। “कुछ व्यक्तियों या संस्थाओं के इशारे पर आवेदन दायर किए जा रहे हैं।” याचिका, जिसमें अदालत ने ये टिप्पणी की है, वन और पर्यावरण मंत्री से पर्यावरण को बचाने के लिए ऋषि गंगा और तपुवन विष्णुगढ़ घाटियों में जलविद्युत परियोजनाओं की मंजूरी रद्द करने की मांग करती है।

मुख्य न्यायाधीश रघुवेंद्र सिंह चौहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की, “याचिकाकर्ता अज्ञात उंगलियों की कठपुतली बन गए हैं।” दरअसल, इस याचिका के संबंध में हाईकोर्ट ने जानना चाहा कि इस याचिका के पीछे का मकसद क्या है! अदालत ने याचिकाकर्ताओं के रिकॉर्ड के बारे में पूछताछ की और समाज सेवा या किसी भी आंदोलन से उनकी संबद्धता को अदालत के सामने ठीक से नहीं लाया गया।

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पर्वतीय क्षेत्रों में चल रहे निर्माण कार्य की तस्वीर।

याचिका की मांग और अदालत की स्थिति
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता डीके जोशी ने हाईकोर्ट में दलील दी। याचिका में कोर्ट की कुछ अहम मांगें रखी गई हैं:

1. पूरे रेशी गंगा और ढोली गंगा क्षेत्र में, राज्य सरकार को पहाड़ों में विस्फोट, नदी के किनारे खनन और चट्टानों को कुचलना बंद कर देना चाहिए।
2. पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए एनटीपीसी और ऋषि गंगा हाइड्रोपावर लिमिटेड को काली सूची में डालने जैसी सख्त कार्रवाई की जाए।
वर्षा। रेनी गांव के सुरक्षित स्थानांतरण के साथ प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया जाए।

ऐसी मांग करने वाली याचिका के पीछे कौन लोग हैं? कोर्ट ने यह सवाल किया। कोर्ट ने कहा, “यह नहीं बताया कि वे अतीत में किस सामाजिक आंदोलन में शामिल रहे हैं या उन्होंने किस तरह के सामाजिक कार्य किए हैं और न ही यह कहा है कि वे किसी गैर सरकारी संगठन या सामाजिक कार्यकर्ता संगठन से जुड़े हैं।” डायरेक्ट लॉ रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने तब याचिका खारिज कर दी और याचिकाकर्ताओं पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे उन्हें हाईकोर्ट एडवोकेट वेलफेयर फंड में जमा करना होगा.

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