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साधारण आंकड़ों के पीछे छिपी थी यशपाल शर्मा की महानता/Yashpal Sharma Dies Former Indian Cricketer greatness was hidden behind simple figures | – News in Hindi

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भारत ने पहला वर्ल्ड कप 1983 में जीता और महाबली कैरेबियाई टीम को वर्ल्ड कप के इतिहास में पहली हार दिलाने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी यशपाल शर्मा ने. भारत ने अपने पहले ही मैच में वेस्टइंडीज को 34 रनों से हराया था, जिसमें यशपाल ने 89 रन बनाए थे और ‘उन्हें मैन ऑफ द मैच’ का खिताब भी मिला था.

स्रोत: News18No
पिछला नवीनीकरण: जुलाई १३, २०२१ ३:१५ अपराह्न IS

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37 टेस्ट में 33.45 का औसत और 2 शतक, 42 वन-डे मैचों में 28.48 का औसत ये आंकड़े किसी महान खिलाड़ी के नहीं हो सकते हैं, लेकिन महानता हर समय कहां आकंड़ों की मोहताज होती है. आंकड़े कभी भी ये साबित नहीं कर पाते हैं कि किसी खिलाड़ी में साहस कितना था. विपरीत हालात में वो कैसी उम्दा पारियां खेल सकता था. अगर इस कसौटी पर तौला जाए तो निश्चित तौर पर यशपाल शर्मा महानता की दावेदारी पेश कर सकते हैं. अगर वो भी काफी ना हो तो कम से कम उनके पास अपने करियर में एक ऐसी उपल्बधि तो निश्चित तौर पर है ही, जिन्होंने उनका नाम भारतीय क्रिकेट में हमेशा के लिए अमर कर दिया है.

कैरेबियाई अश्वमेघ को रोकने वाले थे यशपाल
भारत ने पहला वर्ल्ड कप 1983 में जीता और महाबली कैरेबियाई टीम को वर्ल्ड कप के इतिहास में पहली हार दिलाने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी यशपाल शर्मा ने. भारत ने अपने पहले ही मैच में वेस्टइंडीज को 34 रनों से हराया था, जिसमें यशपाल ने 89 रन बनाए थे और ‘उन्हें मैन ऑफ द मैच’ का खिताब भी मिला था. भारतीय क्रिकेट में इससे बेहतरीन 89 रन की पारी शायद ही किसी और ने खेली हो. 1975 और 1979 में लगातार दो वर्ल्ड कप खेलने के बाद एक भी मैच ना गंवाने वाली कैरेबियाई टीम के अश्वमेघ को अगर किसी ने अकेले दम पर रोका था तो वो यशपाल ही थे और उन्हें अपनी इस पारी पर काफी मान था. करियर में कभी कभी किसी खिलाड़ी को एक ही उम्दा पारी महानता के काफी करीब ले जाती है और यशपाल जी के लिए शायद ये वही पारी थी. इतना ही नहीं उसी वर्ल्ड कप के दौरान इंग्लैंड के खिलाफ सेमीफाइनल मुकाबले में भी यशपाल शर्मा ने सबसे ज़्यादा 61 रन बनाये और भारत ने 6 विकेट से मैच जीता. 1983 वर्ल्ड कप में यशपाल शर्मा की इन दो पारियों की चमक ने उनके करियर के साधारण आकंड़ों को हमेशा के लिए छिपा दिया.

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मैदान के बाहर भी थे वो अल्टीमेट टीममैन

लेकिन निजी तौर पर यशपाल जी मेरे लिए एक चैंपियन खिलाड़ी होने के बजाए एक शानदार इंसान थे. आज भी मुझे याद है जब वो 2003 वर्ल्ड कप के दौरान एक टीवी चैनल के लिए क्रिकेट एक्सपर्ट की भूमिका में नज़र आए. एक युवा पत्रकार होने के चलते मैं अक्सर यशपाल जी को न्यूज़ रुम में बेहद करीब देखकर रोमांचित हो जाता था. अक्सर खाली समय में उनसे क्रिकेट की बातें और किस्से सुना करता था. एक दिन एडिटिंग टेबल पर बैठकर मैं किसी स्टोरी पर काम कर रहा था तो अचानक किसी ने पीठ हल्की सी थपथपाई और चाय का प्याला आगे बढ़ा दिया. मुझे लगा कि किसी सहयोगी ने ऐसा किया है और मैंने औपचारिक तौर पर शुक्रिया अदा किया. तभी आवाज़ आई कि अरे भाई इसमें शुक्रिया अदा करने वाली कौन सी बात है! ये आवाज़ यश पाजी की थी. मैं चौंक गया और कुर्सी छोड़कर उनसे प्यार वाले अंदाज में नाराजगी जाहिर की आखिर उन्हें मेरे जैसे जूनियर के लिए चाय लाने की क्या जरूरत थी. उन्हें बड़े प्यार से मुझे टीम भावना के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि भले ही वो एक टीवी प्रोग्राम से ही जुड़े हों लेकिन हम सभी उस टीम का हिस्सा है. अगर अपनी टीम के खिलाड़ी को वो चाय-पानी भी पिला सकते हैं तो इसमें वो अपना फर्ज़ पूरा कर रहे हैं. आखिर, क्रिकेट के मैदान पर 12वें खिलाड़ी का काम तो ड्रिंक्स पहुंचाना ही होता है! जिस अंदाज़ में और अपनेपन के बोध से यशपाल जी ने ये बात कही उसे याद करते हुए आज आंखें नम हो रही हैं.

खट्टी-मिठ्ठी यादें छोड़ गए हैं यश पाजीलेकिन, ऐसा भी नहीं रहा कि यशपाल जी से बहस से नहीं हुई या उनसे नाराज़गी नहीं रही. जब वो चयनकर्ता बने तो अचानक ही उन्होंने दूरी बढ़ा ली जिससे हमारे जैसे मीडिया के कई पूराने साथियों को ऐसा लगा कि यश जी बदल गये हैं. आलम ये रहा कि एक बार मैनें उन्हें दिल्ली के ताज पैलेस में सार्वजिनक तौर पर बाकि चयनकर्ताओं के साथ हैलो कह दिया तो उन्होंने जवाब देना तो दूर मुंह दूसरी तरफ फेर लिया. काफी नाराज़ हुआ उनके इस रवैये पर. लेकिन, देर शाम उनका फोन आया और उन्होंने कहा कि मेरा गुस्सा शायद जायज है लेकिन अब हालात बदल गयें हैं. वो अब चयनकर्ता थे और पत्रकारों के साथ दोस्ताना संबध का ग़लत मतलब निकाला जा सकता था. कहने का मतलब ये था कि कसी हुई तकनीक के सहारे मैदान पर डिफेंसिव बल्लेबाज़ी करने वाले यश जी मैदान के बाहर निजी ज़िंदगी में भी काफी सतर्कता बरतते थे.

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अगर थोड़ी-बहुत नाराज़गी कभी रह भी गई होती तो यश जी अपने मुस्कराने वाले अंदाज से उसे छू कर दिया करते थे. अपनी शादी के दौरान मैंने उन्हें जब कार्ड भेजा तो वो ना सिर्फ खुद आये बल्कि अपनी बेटी पूजा को भी साथ लेकर आये जो कुछ सालों तक टीवी पत्रकार के तौर पर हमारे पेशे से जुड़ी और हमारी सहयोगी भी थी.

यशपाल जी के इस रिकॉर्ड से अंजान होंगे आप!
चलते-चलते आपको यश जी के ऐसे रिकॉर्ड के बारे में आपको बताना चाहूंगा जिसके करीब अभी फिलहाल कोई भारतीय नहीं है. वन-डे क्रिकेट में यशपाल जी अपने 42 मैचों की यात्रा के दौरान कभी भी शून्य पर आउट नहीं हुए. दुनिया में सिर्फ दो क्रिकेटर ही हुए हैं जिन्होंने उनसे ज़्यादा मैच खेलकर शून्य का मुंह नहीं देखा. एक बात और जिसके लिए यशपाल जी शायद ही उतनी चर्चा मिल पायी थी वो थी उनकी फील्डिंग. आज के रविंद्र जडेजा की तरह यशपाल जी का भी निशाना स्टंप्स पर अचूक हुआ करता था. लेकिन, जबरदस्त तरीक से हमेशा फिट रहने वाले इस खिलाड़ी का ज़िंदगी की दौड़ में इस तरह से रन-आउट होना उनके चाहने वालों को बहुत खलेगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)


ब्लॉगर के बारे में

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

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प्रथम प्रकाशित: जुलाई १३, २०२१ ३:१५ अपराह्न IS

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